Thursday, July 2, 2009

आजकल खून में पहली सी रवानी न रही

आजकल खून में पहली सी रवानी न रही
बचपन बचपन न रहा , जवानी जवानी न रही


क्या लिबास क्या त्यौहार,क्या रिवाजों की कहें
अपने तमद्दुन की कोई निशानी न रही


बदलते दौर में हालत हो गए कुछ यूँ
हकीक़त हकीकत न रही , कहानी कहानी न रही


इस कदर छा गए हम पर अजनबी साए
अपनी जुबान तक हिन्दुस्तानी न रही


अपनों में भी गैरों का अहसास है इमरोज़
अब पहली सी खुशहाल जिंदगानी न रही


मुझको हर मंज़र एक सा दीखता है “दीपक ”
रौनक रौनक न रही , वीरानी वीरानी न रही



सर्वाधिकार सुरक्षित @ कवि दीपक शर्मा

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दिल में जब तक .....

दिल में जब तक मैं-तू नहीं हम हैं
घर बिखरने के मौके बहुत कम हैं .

कौन खींचेगा भला सेहन में दीवार
प्यार जिंदा हो तो फिर कैसा गम है .

जिस्म की छोडिये बिकने लगी औलादे
तरक्की की राह में यह कैसा ख़म है .

खामियां आज उसकी खूबियाँ हो गई
जेब चाक़ थीं पहले अब खूब दम है .

कतरने चन्द बन गईं औरत का लिबास
तहजीब शर्मिंदा है,शर्म के घर मातम है .

ज़ख्म फिर से सभी जवान होने लगे
बता चारागर तेरा ये कैसा मरहम हैं .

माँ की हंसी संग देखा एक हँसता बच्चा
वाह अल्लाह कितनी सुरीली सरगम हैं .

खेलिए वक़्त से मत खेलने दीजिये इसे
वक़्त का खेल दोस्त बहुत बे- रहम हैं .

चैन-ओ-अमन से जीना ईद के मायने
ज़िन्दगी रोकर बसर करना मोहर्रम है.

हाथ फैला कर संवरेगा वतन का मुक्कदर
उनको यकीन है पर हमें उम्मीद कम है.

राम ही जाने अब सफ़र का अंजाम "दीपक"
टूटती साँसे रहनुमा की और तबियत नम है

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